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महाकुंभ: एक दिव्य अनुभव

 महा कुंभ : एक दिव्य अनुभव 

यूं तो महाकुंभ यात्रा पर चर्चा इसके प्रारंभ होने के पूर्व ही प्रारंभ हो चुकी थी और सारे रिपोर्टर इसकी तैयारियों और इसके महत्व को रेखांकित करते संस्करण निरन्तर प्रदर्शित कर रहे थे,अब भी कर रहे है, निरन्तर अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं यह खबर , वहां की व्यवस्था, अखाड़ों की जानकारी, अन्य दिव्य और भिन्न भिन्न अनुभव , इसका इतिहास सब कुछ, पर हम सरकारी कर्मचारी अपनी छुट्टियों को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील होते है , छुट्टियों की व्यवस्था ऐसी हो कि कम से कम छुट्टी का उपयोग करते हुए यह यात्रा संपन्न हो जाए , परन्तु छुट्टी से भी महत्वपूर्ण हो गया था सीट की उपलब्धता, दो बार प्रयास किया, किसी किसी समूह के साथ समायोजित होने का प्रयास किया, मन में एक आह भी थी सारा संसार उमड़ रहा है जिस महाकुंभ में , पूरे 144 वर्ष बाद बनने वाले संयोग को पाने हेतु , हम यहीं भारत में हो कर भी क्या इस संयोग से वंचित रह जाएंगे, लोगों की भीड़ या कहिए जनसमूह , या आस्था का सैलाब , सारा तो उमड़ रहा है अन्य सारी ख़बर तो द्वितीयक हो गई है फिर भी क्या ईश्वर मौका देंगे मुझे भी इस आस्था के सागर में इस संगम में या संगम के किसी भी घाट में डुबकी लगाने का , या बस यूं ही अपनी दैनंदिनी में उलझ कर समय बीत जाएगा , एक हुक सी उठ रही थी , टिकट मिल नहीं रही थी न कोई समूह के साथ समायोजन हो पा रहा था, मन में आया कितनी बार तो केवीएस के कोर्स करने अकेले भी सफ़र किया है निकल जाते है इस बार भी , ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा , लटक कर जाना होगा या थोड़ी मुश्किलात भी आई तो क्या है , देखा जाएगा , लेकिन कहते है न बुलावा आता है तो बुलाने वाला प्रबंध भी करता है, मेरे पूर्व विद्यालय के एक शिक्षक साथी ने संदेश दिया कि वे आज रात्रि महाकुंभ यात्रा के लिए निकल रहे है, एक आशा की किरण जागी तत्काल फ़ोन लगाया, हमें भी साथ ले चलिए , पता चला वे ट्रेन से जा रहे हैं, उन्होंने पूछा क्या आप वास्तव में चलना चाहती है , मैंने कहा,हां लटक कर भी चलने को तैयार हूं , बमुश्किल दो ढाई घंटे में मेरी टिकट की व्यवस्था हो गई , टिकट खिड़की से और सर ने कहा रात्रि 12 बजे की गाड़ी है पहुंच जाइएगा स्टेशन ,समय पर, शाला से घर पहुंचना , तुरंत पैकिंग और स्टेशन पहुंचना, लगा था जनरल में सफर करना होगा पर नहीं मुझे वातानुकूलित में न केवल जगह मिली बल्कि बेहद आराम से बिना किसी विघ्न बाधा के सफर पूरा हुआ।

मुझे एक बार एक बुजुर्ग जिनकी उम्र 70 पार थी , ने कहा था, कभी भी धार्मिक यात्रा के लिए निकले तो कम से कम सामान ले कर चले और आराम या विलासिता के बारे में न सोचे , यात्रा के दौरान भी आपके कर्म ईश्वर की नज़र में होते हैं, आप सब कुछ उस ईश्वर पर छोड़ दीजिए देखिएगा सारी व्यवस्था वहीं संभालेंगे।

तो व्यवस्था तो उस ईश्वर ने ही सम्हाली, हम तो बस निमित्त मात्र थे, प्रयागराज पहुंचते ही सोमेश्वर महादेव मंदिर में भंडारे की शुरुआत हो चुकी थी, मानो हमारी भूख की खबर मां अन्नपूर्णा और महादेव को हो चुकी थी, प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात हम तुरंत ही अरेल घाट पहुंचे , शाम हो चुकी थी ठंड का अहसास था , साथ के बुजुर्गों ने तो इंकार कर दिया लेकिन हम दो तीन हमउम्र साथियों ने डुबकी लगाई , लगा बरसों की साध पूरी हो गई,सफ़र की थकान उड़नछू हो गई पर मन में एक शांति और निर्मलता का एहसास छा गया,अब आगे कहां ठहरे , मैं जिस समूह के साथ थी उन्होंने सेक्टर 8 में बुकिंग कर रखी थी लेकिन वो घाट से 6 से 8 किलोमीटर दूर था और हमारे बुजुर्ग साथी अभी चलने की स्थिति में नहीं थे इसलिए हम लोगों ने वहीं आसपास कहीं विश्राम करने का सोचा उसे समय किसी एक टेंट से एक महिला बाहर आई और बड़े प्यार से उसने अपने टेंट में रुकने का हमें ऑफर दिया उसे टेंट में मूलभूत सारी सुविधाएं मौजूद थी ,दो अस्थाई शिविर थे ,बड़ी से जिगजाग पन्नी बिछी हुई थी ,उसके ऊपर सुखा घास फूस और उसके ऊपर करीब 15 से 20 गद्दे।मजे की बात यह है कि वहां पर टॉयलेट भी बिल्कुल साफ सुथरा था, कुंभ मेला प्रारंभ हुए करीब 25 से 30 दिन हो चुके हैं उसके बावजूद भी टॉयलेट का बिल्कुल साफ सुथरा रहना पानी की उपलब्धता सुखद आश्चर्य का विषय था, वहां पर सबसे मजे की बात यह रही कि कम समान ले जाने के चक्कर में मैं केवल 2 ऊनी शॉल लेकर चली थी , जो वहां की शीत के लिए पर्याप्त नहीं था, परन्तु शिविर में हमें कंबल भी प्रदान किया गया कुल मिलाकर हमारा रात्रि और विश्राम का समय बिल्कुल सुविधा पूर्वक रहा ।

हम महाकुंभ टेंट सिटी में 3 दिन और 2 रात ठहरे और इस दौरान ईश्वरीय निकटता का एहसास लगातार होता रहा, तीन अलग अलग घाटों में डुबकी लगाना, निरन्तर मंत्र ध्वनि, भागवत कथा का कानों में रस घोलना, भिन्न भिन्न स्थानों से आए दिव्य महात्माओं के दर्शन करना, आस्था के सैलाब में डूबे विशाल जनसमूह को देखना सब कुछ अद्भुत था।पांटून पूल से गंगा और जमुना के चारों ओर बसी विशाल टेंट सिटी जो रात्रि में अनोखा दृश्य बना रहे थे यह सब कुछ हृदय पटल में सदा सदा के लिए अंकित हो चुका है।

अब बात करूं प्रबंधन की तो वो भी उच्च स्तर का रहा , ऐसा लगता है स्थानीय शासन प्रशासन ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था, विशाल से विशालतम जनसमूह को संभालना, चप्पे चप्पे पर पुलिस की व्यवस्था लगातार पेट्रोलिंग, लगातार सफाई की व्यवस्था, नदी के भीतर ऐसी मशीन जो निरंतर फूल पत्तियों और अन्य सामग्रियों को नदी से हटा रही है , हर पचास सौ मीटर की दूरी पर यूरिनल और शौचालय, और इनकी सफ़ाई में लगे कर्मचारी , अस्थाई परन्तु मजबूत रास्ते , नदी में नावों की आवाजाही और आसमान में हवाई जहाजों की ,उस पर प्रबंध समिति का बेहद सहयोगात्मक रवैया , पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारियों का शांत और सौम्य व्यवहार, लगातार शासन की पैनी नज़र।

हां कई लोगों को रास्ते और रेलवे के जाम से शिकायत है परन्तु जरा सोचिए 16 लाख की आबादी वाले शहर ने 60 करोड़ के जन समूह को सम्हाला है और संभवतः यह अब तक का विश्व का सबसे अधिक मानव समूह को एकत्र करने वाला धार्मिक आयोजन बन गया है।

एक प्रवचन में मैने सुना था महाकुंभ जाएं तो वहां की थोड़ी मिट्टी लेते आए क्योंकि इस धरा में न जाने कितनी दिव्यात्माओं ने अपने पग धरे है , क्या पता स्वयं महादेव भी वहां पर पधारे हो तो पावन जल के साथ थोड़ी मिट्टी भी ले आई । 

कहने को बहुत कुछ है परन्तु लेख लंबा हो जाएगा इसलिए यहीं विराम लेती हूं ,परंतु ये निश्चित है कि ये मेरे जीवन का एक दिव्य अनुभव है, ऐसा लगता है उस ईश्वरीय चेतना का कुछ अंश हमारे भीतर भी प्रवेश कर गया है 

ईश्वर सभी को खुश रखे।

शेष शुभ 

रागिनी गुरव




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