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महाकालेश्वर धाम में एक दिन

 विद्यालय में चर्चा चल रही थी कहीं चलते हैं साथ साथ क्योंकि सोचते सोचते बहुत दिन बीत जाते है , मैने कहा यदि कही दूर नहीं जा सकते तो अपने पड़ोस में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर आते है , हम घूमने के उद्देश्य से नहीं ईश्वर के दर्शन के उद्देश्य से जाएंगे तो ईश्वर ही प्रबंध भी कर देंगे , बस टिकट बुकिंग हुई , जिस दिन गर्मी की छुट्टियां लगनी थी उसी दिन रात की ट्रेन बीकानेर बिलासपुर से, वहां सीता mam भी मिल गई उनका ट्रांसफर हो गया था राजस्थान, मैं, शिवानी mam , उनकी माताजी और हमारी नन्हीं बॉस केशू , सफर आराम से बीता , निर्विघ्न और साथ जो परिवार था बोगी में उनके साथ भी अच्छे से चर्चा होती रही उनके साथ जो नन्हा अक्षय था वो तो केशू को मेरा है कहने लगा।

स्टेशन में गाड़ी सही समय पर पहुंच गई, कोई 12 बजे के आसपास हम स्टेशन में थे विचार ही कर रहे थे कैसे जाए , कहां ठहरे , e रिक्शा के एक ड्राइवर ने 20 रुपए प्रति सवारी में तय किया उन लोगों का कमिशन बंधा होता है लेकिन हमें भी सौदा महंगा नहीं लगा , हम सबने उसी के दिखाए होटल जुगनू में रूम ठीक किया , नहा धो कर माताजी के लिए रूम में ही खाना मंगाया और हम तीनों महाकालेश्वर धाम की ओर चल पड़े हमने भी वहीं के पास के होटल में खाना खाया , सादी थाली भी स्वादिष्ट थी , फिर धूप बढ़ गई थी फिर भी हम महाकाल लोक की ओर चले , बहुत खूबसूरत और साफ सुथरा है , चूंकि धूप थी तो ज़्यादा लोग नहीं थे पर जो भी थे वे सेल्फी , फोटो खींचा ही रहे थे शिवजी की बड़ी बड़ी मूर्तियां और सुंदर उद्यान , उनकी कहानियों को वर्णन करती हुई दिव्य प्रतिमाएं , बड़ा अच्छा लगा , जाते जाते भस्मारती की बुकिंग की लाइन दिखाई दी पता चला कल तक की सारी बुकिंग फुल है, परसो की बुकिंग के लिए लाइन लगा सकते है, पर हमारी ट्रेन तो अगले ही दिन थी तो हम लोग वापस आ गए , रूम जा कर आराम किया शाम को दर्शन को जाने का तय किया , होटल वाले भैया ने कहा अभी शाम को आप लोग पहले क्षिप्रा नदी की महाआरती अटेंड कर लीजिए क्योंकि वो 7 बजे होती हैं फिर वहीं से हरसिद्धि माता मंदिर की आरती , क्योंकि ये दोनों 8 बजे तक हो जाएंगे फिर आकर आप महाकालेश्वर चले जाएं क्योंकि मंदिर 10 बजे तक खुला रहता है ,हमने ऐसा ही किया, हम क्षिप्रा नदी की ओर चले, नदी की हालत बहुत खराब थी जगह जगह गंदगी, फूल पत्ते जो बहाएं गए थे वो सड गए थे और बदबू मार रहे थे कम से कम नदी की साफ़ सफ़ाई नियमित की जानी चाहिए, जिस नदी के नाम पर इतनी सारी धार्मिक व्यवस्थाएं, उसी की ऐसी हालत , अच्छा नहीं लगा देख कर, लेकिन शाम को हुई महाआरती का दृश्य वास्तव मे अद्भुत और दर्शनीय था , वहां से हम पैदल ही मां हरसिद्धी मंदिर पहुंचे , वहां 1100 दिए एक साथ एक बड़े से पिरामिड जैसे आकार में जलाए जाते है , ये भी बहुत सुन्दर और दर्शनीय दृश्य था , वहां से हमने फिर e रिक्शा ठीक किया और महाकाल लोक की ओर चले , रात को लाइटिंग में महाकाल लोक और भी सुन्दर दिख रहा था पर हमें तो मंदिर जाना था , मंदिर के लिए लंबी लाइन थी पर ये तो स्वाभाविक ही है, भोले नाथ की जय , हर हर महादेव के नारे के साथ हम अंदर पहुंचे लेकिन ऐसा लगा भगवान महाकाल के दर्शन हम टीवी में ही कर के आ गए है , गर्भ गृह तक प्रवेश भी नहीं मिला और ज़्यादा देर रुकने भी नहीं, बमुश्किल 1 से 2 मिनट , लेकिन वहां से बाहर निकले तो बाहर मंदिरों की कतार थी , सिद्धि विनायक मंदिर , साक्षी गोपाल मंदिर , नरसिंह भगवान , माता रानी, और भी न जाने कौन कौन से, फिर वहां थोड़ी देर के लिए बैठ गए ,।बड़ा अच्छा लगा, वहीं बैठे रहने का मन किया लेकिन सिक्योरिटी वालों ने 10 बजते ही सबको बाहर करना शुरू किया। हरसिद्धी मंदिर में पूरी सब्जी का प्रसाद मिल गया।

वहां से वापस आए भूख तो नहीं लग रही थी क्योंकि दोपहर को ही पेट भर कर खाया था और प्रसाद भी ,कुछ कोल्डड्रिंक वगैरह लिए और होटल के रूम में आ गए आराम करने । रात को सोते सोते कोई 12 बज गए क्योंकि अपने साथी थे तो बात करते करते देर हो गई, लेकिन ऐसा मौका स्कूल में कहां मिलता है और अगले ही दिन तो वापस भी जाना था , पर सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गई, तो उठ कर नहाना धोना कर लिया आज मुनि संदीपनी आश्रम और भैरव बाबा मंदिर जाने का तय किया था हमने पर मन में एक इच्छा रो रही थी काश एक बार और बाबा महाकाल के दर्शन हो जाएं, मैं सुबह सुबह तैयार हो चुकी थी, पर मैंने अपने साथियों से कहा तो उन लोगों ने भी कहा कि ठीक है हम नाश्ता कर लेते है और माताजी के लिए यही नाश्ता पहुंचा देते है और मंदिर दर्शन कर के आ जाएंगे तो भी 9 साढ़े 9 तक हम दूसरे मंदिरों के दर्शन को निकल सकते है, तय हुआ फिर मैं केशू और शिवानी हम तीनों नाश्ता करने गए, महाकाल मंदिर के सामने के ही एक होटल में, dosa और आलू पराठा , नाश्ता एकदम गरमा गर्म और स्वादिष्ट था, खा के एकदम आनंद आ गया , केशू को हमने माताजी के लिए नाश्ता पहुंचा कर आने को कहा तब तक हम दोनों यानी मैं और शिवानी  पैदल पैदल चलने लगे, पर शिवानी पैदल चल नहीं पा रही थीं उसी समय महाकाल मंदिर में यात्रियों की सुविधा के लिए जो गाड़ी रहती हैं वो मिल गई उसने हमें परिसर तक छोड़ दिया लेकिन आज सुबह कल से ज़्यादा भीड़ थी , शिवानी की हिम्मत नहीं हो रही थी इतने भीड़ में अंदर जाने की , mam ने कहा कि वो परिसर में ही बैठ कर प्रार्थना करना चाहती है, लेकिन मेरी तो इच्छा महाकाल के दर्शन की थी फिर तय हुआ कि mam जब तक प्रार्थना करेगी मै तब तक दर्शन कर आऊंगी हम दोनों के पास अपने अपने मोबाइल है कॉन्टैक्ट कर लेंगे , लेकिन कहते है न मंदिर में अगर आप जा रहे हैं और ये कह रहे हैं कि मैं इतने समय में वापस लौट आऊंगा तो ये नीरा अहंकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है, क्या आप इतने बड़े हो गए है कि भगवान को टाइम दोगे, आज मुझे हंसी आती है अपनी मूर्खता पर।

आगे जो हुआ वो तो सच में भगवान की ही मर्जी थी , मैं लाइन में लग गई पर सिक्योरिटी वालों ने रोक दिया , कल रात को तो हमें मोबाइल के साथ प्रवेश मिल गया था लेकिन आज नहीं जाने दे रहे थे, उन्होंने वहां मोबाइल जमा कराने को कहा, जा के देखा तो वहां भी लंबी लाइन लगी थी, मालूम होता तो मोबाइल मै शिवानी को ही दे देती लेकिन वो तो परिसर के अंदर चली गई थी, अब क्या करूं , एक बार मैने सिक्योरिटी को चकमा भी दे कर जाने की कोशिश की लेकिन उसने पकड़ लिया ओ मैडम आप की चेकिंग हो गई है क्या? मोबाइल है आपके पास, मैंने कहां हां , जाइए जमा कर के आइए , मोबाइल जमा करने की लाइन इतनी लंबी थी कि आराम से 1 घंटा लग जाता , सोचा चलो मैं भी परिसर में जा कर शिवानी मैडम की तरह ही प्रार्थना कर लेती हुं, मन में एक निराशा आ गई थी , लेकिन और मजे की बात अब तो परिसर में भी घुसने नहीं मिला वहां भी सिक्योरिटी, मैंने कहां मेरे एक परिचित भीतर है उन्हें लेने जा रही हूं, तो उन लोगों ने कहा अन्दर किसी को रुकने नहीं दिया जा रहा है आपके परिचित आ जाएंगे आप यहीं इंतजार कीजिए , अब तो मैं और निराश हो गई न प्रार्थना कर सकी न महाकाल के दर्शन , मैंने mam को फोन लगाया तो mam ने नहीं उठाया मुझे लगा वे ध्यान में बैठ गई होंगी ,पर मैं वहां रुकी नहीं एक दूसरा प्रवेश द्वार दिख रहा था सोचा वहां जा कर देखती हूं, वहां गई तो स्पेशल दर्शन की लाइन लगी थी , ये लाइन ज्यादा लंबी नहीं थी बल्कि महिला की लाइन तो खाली ही थी मुझे लगा चलो एक मौका मिल रहा है टिकट ले लेते है टिकट 250 की थी ऑनलाइन की सुविधा नहीं थी और मेरी जेब में 300 rs मात्र थे अब बताइए, क्या ऐसे अवसर को कोई गंवाता, मैंने तुरंत टिकट लिया और अंदर जाने को उद्यत हुई, लेकिन यहां भी वहीं पेंच था मोबाइल जमा करिए देखा तो यहां भी लाइन, लेकिन ये लाइन उतनी लंबी नहीं थी, शायद 5 6 लोग थे ,मैं लाइन में लग गई, लाइन में लगी तभी शिवानी मैडम का फोन आ गया वो वापस आ गई थी मैने उन्हें कहा मैं लाइन में हूं मोबाइल जमा करने के ,उसके बाद अंदर जाऊंगी मुझे 15 से 20 मिनट निश्चित लगेंगे अगर आप रूम जाना चाहे तो जा सकती है,लेकिन mam ने कहां वे वहीं इंतजार कर रही हैं, अब मैं अंदर गई तुरंत जल्दी जल्दी , दर्शन किए और वापस आ गई इतना सब होने में 10 से 15 मिन ही लगा लेकिन अब मुझे ये नहीं समझ आ रहा था कि मैने मोबाइल जमा कहां किया है क्योंकी आने जाने के रास्ते अलग थे , तो वहां एक सिक्योरिटी वाले को पूंछा उसने पर्ची दिखाने को कहा और कहा ये तो स्पेशल दर्शन की पर्ची हैं और फटी नहीं हैं मतलब आप नॉर्मल लाइन से वापस आ गए क्या ? मुझे कुछ समझ नहीं आया उन्होंने कहा आप ये एग्जिट गेट से ही चले जाएं और गार्ड को बता देना अच्छे से एक बार और दर्शन कर के आ जाइए, मुझे शिवानी mam के लिए थोड़ा बुरा लग रहा था लेकिन इस अवसर को भी मैने ईश्वर का आशीर्वाद माना मै फ़िर वापस गई अब मुझे नीचे तक जाने का अवसर मिला , बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन का सौभाग्य, लेकिन कृपा यहीं नहीं खत्म हुई , मैंने  दर्शन किए और लोगों के आने जाने पर रोक लग गई, क्यों ?, क्योंकि बाबा के भोग आरती का समय हो गया था, यह दिव्य अनुभव, मेरी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे, बाबा ने इतने सुंदर दर्शन दिए कि जीवन धन्य हो गया , पूरे भोग आरती तक मैं महाकाल के दर्शन का पान करती रही , यह अद्भुत सौभाग्य, हे महाकालेश्वर बाबा , हे उज्जैन के सरकार तेरी जय जय हो बाबा , मैं तो कुछ भी नहीं पर तूने मेरी झोली भर दी बाबा।

पूरी आरती में ढोल , मृदंग की आवाज़, बिल्कुल कैलाशवासी भेष में कुछ साधू बाबा का झुंड , दृश्य बड़ी सी स्क्रीन में भी दिखाई दे रहा था और बिल्कुल समक्ष भी ,  आरती खत्म होने के बाद निकली तो मन में एक भरपूर शांति थी , ये विचार भी आया कि काश शिवानी मैडम भी थोड़ी हिम्मत कर के अंदर चल देती तो इस दिव्य पल की वो भी साक्षी बन जाती, पर मुझे ऐसा लगता है जिसकी जैसी इच्छा थी ईश्वर ने उसे वैसे ही दर्शन दिए मेरी इच्छा महाकाल के दर्शन की थी और शिवानी mam की इच्छा परिसर में बैठ कर मौन प्रार्थना की दोनों की ही इच्छा पूरी हुई, हां मेरे कारण उन्हें थोड़ा बाहर इंतजार करना पड़ा।

यहां ये भी बताना लाज़मी है कि हमारी महाकाल धाम  जाने की टिकट 1 तारीख की थी और 2 अप्रैल से मुझे ट्रेनर के रूप में कोलकाता जाना था , लेकिन बाबा की ऐसी कृपा रही कि वो लेटर मेरे पास पहुंचा ही नहीं, पहुंचा कौन सा लेटर , वो ट्रेनिंग पीरियड प्रीपांड होने का , और वहां मै इसलिए नहीं जा सकती थी क्योंकि ऑलरेडी मेरी एक दूसरी ट्रेनिंग niser में उसी डेट पर थी , वो कहते है न, बुलावा आता है तभी जाना होता है और प्रबंध करने वाला प्रबंध भी कर देता हैं।

कुल मिलाकर इस यात्रा ने मेरे भीतर विश्वास को और मज़बूत किया है और मैं आज भी यहीं कहती हूं यात्रा में जाए तो पर्यटन के उद्देश्य से जाने की बजाय भक्ति के उद्देश्य से जाए , व्यवस्था उसे सौंप दे , सब मंगल होगा निश्चित ही।

हर हर महादेव 

रागिनी गुरव 


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