Skip to main content

Posts

Showing posts from October, 2019

एक कप चाय की क़ीमत

शुभी लंच ब्रेक में भी अपना काम निपटाने में लगी हुई थी। सहकर्मियों से वार्तालाप भी चालू था अचानक बातचीत पतियों पर जा टिकी।सुबह हम दोनों को ही ऑफिस के लिए निकलना होता हैं,लेकिन काम सारा मुझे ही करना पड़ता है। ज्यादातर सहकर्मी सहमत थीं।हालांकि इसमें शिकायत से ज्यादा हसी मजाक का पुट था।आखिर पति होते ही ऐसे है।मिसेज मानसी ने कहा ,हा मेरे पति भी केवल सुबह की चाय बना कर देते है,और कुछ नहीं करते,अचानक शुभी के हाथ रुक गए।केवल चाय ।इस एक चाय के लिए ही अक्सर वो कितना तरस जाती है,सुबह उठते बराबर सबसे पहले एक चाय की ही तो तलब होती है ,लेकिन उठते बराबर पहले कुकर चढ़ाओ,फिर बच्चों का ,अपना टिफिन तैयार करो,दोपहर के लंच की भी तैयारी करके रखनी होती है,फिर टिफिन पैक करना ,बोतल भरना,खुद तैयार होना,भागते दौड़ते ऑफिस पहुंचना ,उसमे भी एक डर अगर रजिस्टर बॉस के कमरे में पहुंच गया तो,उनका घूरता हुआ चेहरा देखना। उफ़ कितनी मारामारी होती है सुबह समय की,कई बार चाय बना तो लेती है लेकिन गरमागरम चाय पीने का वक्त नहीं होता।बनी बनाई चाय आने के बाद फेकनी पड़ती है।कितना अफसोस होता है,हा जिस दिन चाय का प्याला पी लेती ,ऐस...

पेशा,एक शिक्षक का

क्या आसान है एक शिक्षक होना ।कई लोगों को लगता है कि इस पेशे में भरपूर छुट्टियां मिलती है, पढ़ाना है तो पढ़ाओ नहीं तो कौन देख रहा है बच्चों के साथ टाइमपास कर लो ।बढ़िया आरामतलब नौकरी हैं ,लेकिन जरा ठहरिए अपनी राय बनाने के पहले और अगर आपका ख्याल इस पेशे को हल्का आंकने का है ,तो जरा एक शिक्षक से वार्तालाप कर ले जो वास्तव में खुशी से इस पेशे में आया है,और कुछ बातों का जवाब जरा दिल से दीजियेगा फिर अपनी राय जाहिर करिएगा। तो चलिए शुरू करते है ,सबसे पहले यह आप के धेर्य की परीक्षा हैं,आप अपने विषय में बेशक बेहद माहिर होंगे लेकिन आपको सिखाने के हर कदम पर धीरज रखना होगा ,आपके लिये जो केवल एक वाक्य है,वो आपके विद्यार्थियों के लिए २०या ३० शब्दों का एक गुच्छा है,और ये गुच्छा भी सीधा सादा नहीं बल्कि जलेबी की तरह उलझा हुआ और उस सरल से वाक्य का1सिरा पकड़ कर आपको उन्हें देना है,ना ना जरा ठहरिये,उस सिरे को उन्हें खुद ढूंढने के लिए प्रेरित करना है और जो काम आपके लिए बेहद आसान है, हो सकता है आपके विद्यार्थियों के लिए एक लंबी प्रक्रिया हो और हां यहां हर कदम पर यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रक्रिया पूरी तरह स...

आशा है तो आकाश है

कहते है कि किसी कहानी का अंत या तो सुखद होगा या फिर दुखद या फिर कहानी का अंत पाठक के उपर छोड़ दिया जाएगा ,चाहे जो भी हो लेकिन मै निराशावादी कहानियों के प्रति सहज नहीं रह पाती।आखिर कोई कहानी निराशावादी कैसे हो सकती है,मेरे ख़्याल से कहानी अधूरी हो सकती है परन्तु निराशावादी नहीं,निराशा में भी कहीं ना कहीं आशा की एक लौ टिमटिमाती रहती है, हमेशा। कई फिल्में जब टीवी पर दुबारा देख रहे हो तो वो भाग जिसमें आशा हो , ख़ुशी हो दोबारा देखने का मन करता है ,वहीं निराशा वाले भाव में चैनल बदलने में वक्त नहीं लगता। एक फिल्म आयी थी बहुत पहले ' एक दूजे के लिए'.बड़ी प्यारी पिक्चर है लेकिन जाने क्यों फिल्म का अंत देखने का मन नहीं करता।ऐसे ही राजश्री की जितनी भी फिल्में है,उसकी आशा और खुशी के कारण कहानी मालूम होते हुए भी बोरिंग नहीं लगती। कितनी भी निराशा क्यों ना हो आशा की पतवार अगर हो तो भारी तूफान से भी नाव को किनारे लगा ही देगी। क्यों आपको ऐसा नहीं लगता? आशा है तो आकाश है।