वो जो छुट्टियां थी हम लोग 80 90 के दशक की पीढ़ी है , न टीवी न मोबाइल, इंटरनेट के बारे में तो कोई सोच भी नहीं सकता था, मनोरंजन का एकमात्र साधन था फिल्में, वो भी एकल सिनेमा घर, और वहां जाना,फिल्म देखना, किसी त्योहार से कम नहीं होता,बाकायदा प्लानिंग बनाई जाती, लंबी लाइन लगी होती और कई बार ऐसा होता कि देखने गए है 3 से 6 की फिल्म लेकिन भीड़ के कारण टिकट नहीं मिली और अगले शो तक वहीं कहीं टाइमपास करते, लेकिन चाव इतना कि फिल्म देखे बगैर लौटते नहीं, फिल्म देखने के लिए एक-एक चिल्लर पैसे का इंतजाम करना भी एक चैलेंज और एक बड़ा मिशन ही था, 3 साल तक के बच्चे का टिकट नहीं लगता था तो मेरा छोटा भाई 6 साल का होते तक भी 3 का ही बना रहा। खैर बात करते है,गर्मी की लंबी छुट्टियों की , दादी ,नानी के घर जाने की कहानी ज्यादा याद नहीं है लेकिन याद है लाइब्रेरी से पुस्तकों का लाना , उस समय इसका बड़ा क्रेज था मोहल्ले में लगभग हर घर के लोग छुट्टियां आते ही लाइब्रेरी जरूर लगा लेते अब जिसका एग्जाम पहले खत्म होता, वो तो आराम से लाइब्रेरी से लाई रंगीन अमर चित्र कथाओं का आनंद उठाता और हम कोर्स की बुक कॉपी में घुसे ...