तकनीकी शिक्षा में हिंदी की भूमिका
मैं बोना चाहता हूँ फसल विज्ञान की
समृद्ध करना चाहता हूँ अपने परिवेश को तकनीक के ज्ञान से
पर हिचकिचाता हूँ जब कोई मेरे समक्ष मेरे ज्ञान से अधिक तरजीह देता है एक विदेशी जुबान को
ठहर जाता हूँ कहीं ???
क्या ये नहीं संभव कि मुझे सीखने और सिखाने का अवसर मिले मेरी अपनी जबान में
भाषा सदैव से ही मनुष्य के हृदय के उद्गार को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम रही है ,अगर हृदय के उद्गार अपनी मातृभाषा में व्यक्त किए जाए तो वह सहज ही समझ आते हैं,और दूसरों को प्रभावित भी करते हैं ,साथ ही आगे बढ़ने हेतु प्रेरित भी करते हैं, जब बात तकनीकी शिक्षा की आती है तो भारतवर्ष में अधिकांश तकनीकी शिक्षा विदेशी भाषा अर्थात अंग्रेजी भाषा में दी जाती है और तकनीकी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अनेक तकनीकी शब्दों का प्रयोग जो विदेशी भाषा यानी की अंग्रेजी में सहज है ,उतना आसानी से उसका प्रयोग हिंदी भाषा में नहीं किया जा सकता जबकि यह संपूर्ण रूप से सत्य नहीं है, जब किसी भी प्रकार का ज्ञान अथवा विज्ञान मनुष्य को अपनी भाषा में प्रदान किया जाए ,या मनुष्य अपनी भाषा का प्रयोग करते हुए उसे आगे बढ़ाएं तो वह न केवल उन्नति की ओर प्रगतिशील होता है, बल्कि उस ज्ञान का प्रचार प्रसार सार्वभौमिक एवं सार्वजनिक रूप से किया जा सकता है । उदाहरण के लिए जब छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है तब विदेशी भाषा उन पर अधिकतर थोपी जाती है वे विदेशी भाषा में ज्यादातर सहज नहीं होते अधिकांश बच्चे जो चाहे अंग्रेजी माध्यम की शालाओं में प्रवेश कर रहे हो या किसी हिंदी माध्यम की शाला में, जब भी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते हैं,तब उस वक्त भी अपनी मातृभाषा के प्रति सहज होते हैं अगर मातृभाषा के माध्यम से बचपन में ही उनके मन में तकनीकी शिक्षा के बीज बो दिए जाए तो संभव है कि वे तकनीकी शिक्षा के प्रति न केवल जागरूक होंगे अपितु उनके भीतर एक विशेष रुचि भी परिष्कृत होगी ।
तकनीकी शिक्षा में हिंदी की भूमिका राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आधार पर भी एक आवश्यक पहल है, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु एक मुख्य पहल हैं।
“वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग” क्षेत्रीय भाषाओं में विश्वविद्यालय स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन को बढ़ावा देने हेतु अनुदान प्रदान कर रहा है, अभी कुछ राज्यों में यह पहल प्रारंभ की गई है कि इंजीनियरिंग एवं मेडिकल अर्थात चिकित्सा की पढ़ाई भी हिंदी भाषा में उपलब्ध की जा सके।
कई लोगों का यह कथन है कि इन भाषाओं में जो तकनीकी शब्द है उनका प्रयोग अंग्रेजी में इस कदर घुसपैठ कर चुका है कि उसका हिंदी अनुवाद करना संभव नहीं है, परंतु यह सत्य नहीं है आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए हिंदी के द्वारा कोई भी व्यक्ति सहज होता है और हिंदी यानी अपनी मातृभाषा के द्वारा तकनीकी शब्द को भी अगर समाज में व्यापक रूप से प्रचारित एवं प्रसारित किया जाए तो वह सहज ही मनुष्य के मन और मस्तिष्क में अपना प्रभाव जमा सकता है , सच तो यह है कि अपनी मातृभाषा के द्वारा हम अगर विदेशी भाषा को सीखने का प्रयास करें तो यह भी एक सहज प्रक्रिया होगी और इससे मनुष्य के मस्तिष्क का भी विकास होता है , तो वास्तव में जरूरत किस बात की है ? जरूरत है तकनीकी शब्दों को समाज में स्वीकार्य बनाया जाए अपनी भाषा में, यानी कि हिंदी में, और फिर उसे किसी विदेशी भाषा में सीखने सिखाने का अवसर मिले तो उसमें भी किसी प्रकार का संकोच न हो परंतु होता क्या है विद्यार्थी को विज्ञान एवम् तकनीकी से परिचय कराने के पूर्व ही एक विदेशी भाषा का खौफ उसके भीतर डाल दिया जाता है ,जिससे वह अक्सर अपनी दिशा बदलने को विवश हो जाता है , क्या ही अच्छा हो तकनीकी की सुगमता सभी के लिए हिंदी भाषा अर्थात मातृभाषा में कर दी जाए वैसे भी हिंदी का क्षेत्र अधिकांशतः आज के समय में न केवल भारतवर्ष में बल्कि विश्व के अधिकांश लोगों के मध्य तेजी से हो रहा है, हिंदी आज विश्व की जानी मानी भाषा है। तकनीकी शब्दों को आसानी से हिंदी में आत्मसात कर सकते हैं हिंदी का प्रयोग न केवल विज्ञान को बढ़ावा देने में बल्कि प्रयोगधर्मिता को भी आगे ले जाने की ओर एक उत्साह जनक पहल होगी, आखिर हिंदी का प्रयोग करने में समस्या क्या है ?
भाषा विभाग के द्वारा जो प्रयास किया जा रहा है कि हर तकनीकी शब्द को हिंदी अनुवाद किया जाए और उसे हिंदी में सभी के लिए सहज किया जाए तो अगर यह प्रयास सभी के द्वारा आगे बढ़ाया जाए तो निश्चित रूप से यह एक क्रांतिकारी कदम होगा ,क्योंकि कई ऐसे बच्चे होते हैं जो सिर्फ और सिर्फ विदेशी भाषा के भय के कारण तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने से कतराते हैं और वैसे भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ अन्य विषय का भी अपने शिक्षण में समावेश कर सकता है तो अगर तकनीकी शिक्षा भाषा अर्थात हिंदी में दी जाएगी तो विद्यार्थी का सृजन भी विकसित होगा और वह वैज्ञानिक प्रयोग करने में भी नहीं हिचकेगा , संभव है गली-गली मोहल्ले मोहल्ले से आपको वैज्ञानिक सोच प्रदान करने वाला एक विद्यार्थी निकलता हुआ दिखाई दे जो आज केवल विदेशी भाषा के अनिवार्यता के कारण संभव नहीं हो पा रहा है।
अगर ज्ञान स्वभाषा मे विकसित हो तो सभी के लिए उन्नति के मार्ग खोल देता है , कंप्युटर के फॉन्ट आसानी से हिन्दी के लिए विकसित किए जा सकते है ,दिशा निर्देश भी हिन्दी भाषा में अधिक ग्राह्य है केवल जरूरत है ईमानदार सोच की ।
जब एक विद्यार्थी को कहा जाता है “होल्ड द बीकर अप्साइड डाउन “ तो वो यहाँ 3 शब्दों के साथ कुश्ती कर रहा होता है , होल्ड, अप्साइड, डाउन जबकि यदि यही बात उससे हिन्दी मे कही जाए बीकर को उल्टा पकड़ो तो वह आसानी से समझ जाता है ।
जरूरत है हर जिज्ञासु एवं ज्ञान पिपासु के लिए तकनीक को भी सुलभ बनाया जाए और इसमें हिन्दी एक अहम भूमिका निभा सकती है ।
रागिनी गुरव
केन्द्रीय विद्यालय ,दुर्ग
- धन्यवाद शेष शुभ
Comments
Post a Comment