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साक्षात्कार: एक सोच

 आज साक्षात्कार पैनल में जब मेरे नाम की घोषणा हुई तो थोड़ा आश्चर्य ,थोड़ी घबराहट और थोड़ी उत्तेजना भी महसूस हुई , पता नहीं मैं न्याय कर पाऊंगी या नहीं ,सही मूल्यांकन हो सकेगा या नहीं,लेकिन आज बात इंटरव्यू लेने के अपने अनुभव की।

करीब डेढ़ से 2 सौ अभ्यर्थी थे ,प्राइमरी टीचिंग job के लिए,

अधिकतर तो न्यूनतम योग्यता से ज्यादा ही थे ,काफी उच्च प्रशिक्षित ,कुछ इंजीनियर भी ,कुछ मैनेजमेंट वाले भी ,क्योंकि न्यूनतम योग्यता 12 th पास थी इसलिए अधिकांश ने आवेदन किया था ,लेकिन साक्षात्कार लेने के दौरान कई बातें आई जेहन में जिसे साझा करना चाहती हूं।

इतनी भारी संख्या में अभ्यर्थियों के होने के बावजूद योग्य अभ्यर्थियों की संख्या बेहद कम थी , मैंने देखा है लोग अक्सर सिस्टम को दोष देते है बेरोजगारी के लिए लेकिन इतनी भारी भरकम डिग्री होने के बावजूद जिस योग्यता की हम तलाश कर रहे थे वो बहुत कम लोगों में ही थी या कई लोगों को संभवत ये लगा होगा कि प्राइमरी में क्या पढ़ाना है ये तो बहुत आसान है ....

कई अभ्यर्थी तो कम्युनिकेशन स्किल्स में ही कट जा रहे थे ,हम बचपन से बच्चों को सिखाते है ,किसी पेड़ के बारे में पांच लाइन ,या किसी प्राकृतिक दृश्य के बारे में लेकिन अभ्यर्थी एक या दो लाइनें भी नहीं बोल पा रहे थे ,कई तो प्रयास भी नहीं कर रहे थे सीधा sorry , और तो और  कुछ के पास डिग्री थी स्नातकोत्तर इंग्लिश की पर वे 5th क्लास के poem की दो लाइन भी समझा न सके।

कई लोगों को जब कहा गया अपने पसंदीदा टॉपिक पर कुछ भी पढ़ा के दिखाइए ,तो ये भी उनके लिए असंभव सा task था,कुछ तो हाथ में डस्टर लेकर इतने आराम से बोर्ड को साफ कर रहे थे जैसे इसी में टाइम पास हो जाए ,जबकि टीचिंग job में तो ये सामान्य है कि आपसे कुछ पढ़ाने को कहा जाए ।

और तो और सामान्य इंग्लिश की जानकारी भी न होना बेहद आश्चर्य करने वाला अनुभव था ,एक वाक्य भी अनुवाद ना कर पाना या सिंपल शब्दों में भी मात्रा या स्पेलिंग की गलतियां ।

कुछ अभ्यर्थियों का ड्रेसिंग सेंस भी अजीब था ,एकदम टाइट लेगिस या उटपटांग कपड़े ,आखिर साक्षात्कार के लिए एक सीधे सादे वस्त्र का चुनाव भी तो आवश्यक है ।

सब्जेक्ट नॉलेज यानी सामान्य जानकारी भी बेहद कम थी कई लोग तो अभी तक भारत वर्ष में राज्यों एवम् केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या भी नहीं बता सके ।

ठीक है कई लोग ये कह रहे थे ,हम हिंदी मीडियम से है तो क्या हुआ आप अपनी बात हिंदी में भी तो आत्मविश्वास के साथ कहिए सीधा सरेंडर कर देना,कहां का न्याय है ?

हां मुझे याद है जब हम लोग कॉलेज के तुरंत बाद कई जगह साक्षात्कार के लिए जाते थे तो हमें तो हिंदी मीडियम सुनते ही आउट कर देते थे सचमुच में बेहद अपमान महसूस होता था लेकिन स्वयं को निरंतर मांजना पड़ता है , हर इंटरव्यू के बाद खुद में कुछ न कुछ improvement करना होता है और सबसे जरूरी बात अपनी स्किल को निरंतर बढ़ाते रहना होता है।

पर दो बाते जो आवश्यक है , एक तो कम्युनिकेशन स्किल और दूसरा सब्जेक्ट नॉलेज

बाकी और भी बाते होती है लेकिन उपरोक्त दो बातों के बिना तो मुश्किल ही हैं ।

उम्मीद है आपको कुछ तो सहायता मिलेगी मेरी बातों से ।

आगे याद आने पर और जोडूंगी आज बस इतना ही 

शेष शुभ।

रागिनी गुरव 

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