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कैसी ये सोच

 आज ऑफिस में मिसेज नलिनी दिखी ,अभी अभी दिल्ली से लौटी है ,ऑफिशियल काम से ,परीक्षा पे चर्चा पर बच्चे को लेकर गई थी ,सब बहुत बढ़िया रहा ,मेरी नज़र अटकी उनके सूट में ,जैकेट वाला कुर्ता था ,मैने सहजता में पूछा ,राजधानी की खरीदारी ,ये सूट तो बढ़िया है ,no need of दुपट्टा ,वो मुस्कुरा दी , no need दुपट्टा , सुबह तो थी बिना दुपट्टा के,लेकिन कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा ,कहने लगे ये दिल्ली नहीं है,दुपट्टा ले लो ,मुझे समझ नहीं आया ,भला जैकेट वाले सूट में दुपट्टा क्यों ज़रूरी है, हां कोई शौकिया लेना चाहे तो अलग बात है और तो जिस महोदया ने मना किया था वो खुद कई बार साइड दुपट्टा लेकर आ चुकी है ,अगर इतना ही अपरिहार्य है तो बिलकुल टिपिकल अंदाज में ले।

वैसे भी ढीले ढाले कुर्ते के ऊपर कई बार दुपट्टे की आवश्यकता नहीं होती ,और मैंने मुंबई में भी वर्कशॉप में यंग से old सभी रिसोर्स पर्सन को ढीले कुर्ते और जींस में ही देखा ,और वे बेहद कंफर्ट भी थे ,लेकिन ये कहना कि ये दिल्ली नहीं है या ये मुंबई नहीं है ,तो बेहद संकीर्ण सोच है ,आखिर दिल्ली ,मुंबई भारत में ही तो है ना ।

कुल मिलाकर मुझे तो यहीं समझ में आता है कि महिलाएं खुद ही कई बार अपनी लकीर से आगे निकलना नहीं चाहती ,या कोई अन्य महिलाएं निकलना चाहे तो पीछे खींचने के लिए भी तैयार रहती है।

हां वस्त्र मर्यादा अनुरूप जरूर हो ,लेकिन अपने कंफर्ट का भी ध्यान रखें। 

बाकी तो लोगों का तो काम ही है कुछ न कुछ कहना ।

शेष शुभ

रागिनी गुरव 




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