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राम भरत मिलाप

श्री राम चरित मानस का सर्वाधिक हृदयस्पर्शी प्रसंग है राम भरत मिलाप,आज के समय में सर्वाधिक प्रासंगिक भी ।

आज जब सारी पार्टियों में केवल राजसत्ता पाने के लिए जोड़तोड़ लगी रहती है और धन सम्पत्ति के लिए लोग नाते रिश्तेदारों से भी बैर कर बैठते है ऐसे में राम भरत मिलाप की कहानी अत्यंत भावुक कर देती है एक ओर राम है ,जो नहीं चाहते कि केवल बड़े भाई होने के नाते मुझे राजगद्दी मिले और दूसरी और भरत है जो जब श्री राम के वन गमन की बात सुनते हैं तो स्वयं को ही दोषी ठहराने लगते है, वे  नहीं चाहते, स्वयं राज करें ,वह राज जो उन्हें तश्तरी में परोसा गया था, उनके पिता ने वचन दिया था, माता ने उसके लिए प्रपंच रचा था, उस राज को भी कतई नहीं स्वीकार कर पाते, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके बड़े भाई के साथ छल हुआ है,जबकि माताएं,गुरुजन सभी उन्हें राजा के रूप में देखने के लिए तैयार है।

उनका पश्चाताप, उस भूल के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं, अपने आराध्य बड़े भ्राता के दुःख की वेदना और उस वेदना को महसूस करती है माता कैकई ,माता सुमित्रा और माता कौशल्या और महसूस करती है सारी अयोध्या ,लोग भरत के इस आग्रह को देख इस उम्मीद में भर जाते है कि अब अवश्य ही राम वापस अयोध्या लौट आयेंगे,लेकिन वे दृढ़ प्रतिज्ञ राम को भी जानते है ऐसे में सब उहापोह की स्थिति में है जाने क्या हो !

सारी अयोध्या नगरी पहुंच गई वन में राम को वापस लाने माताओं ने दुहाई दी,कैकई ने अपने वचन वापस लेने की बात कही कुल मिलाकर आज की स्थिति होती तो बात खत्म हो जाती , चलो भूल सुधार कर लिया जाए ,बात खत्म ,लेकिन क्या ये इतना आसान था ,श्री राम को मनाना जिस पिताश्री को  वचन दिया था वे तो परलोकवासी हो गए ,और आखिर भरत क्यों न बने राजा ,आखिर कमी क्या है भरत में फिर श्री राम तो दूरदृष्टा है जान रहे है ,निहितार्थ क्या है इस होनी का पर सम्मुख आई इस स्थिति से निपटना भी तो आसान नहीं ।

एक तरफ भरत का प्रेम और दूसरी ओर श्री राम का धर्म पालन के प्रति आग्रह ,कौन सा पलड़ा भारी है तय करना मुश्किल ,सबके अपने तर्क है ,सारी प्रजा , माताएं,गुरुजन और सारी सृष्टि ही श्वास रोके इस विचित्र परिस्थिति को देख रहे है क्या होगा , मजे की बात ये कि ये लड़ाई थी प्रेम की ,त्याग की एक दूसरे को सुख देने की , यहां प्रेम की पराकाष्ठा थी ,धर्म की मर्यादा थी ।

ऐसे में आगमन होता है विदेह राज जनक का ,जिनके न्याय पर देवताओं को भी विश्वास है ,अब जरा सोचिए क्या कोई पिता ये चाहेगा कि उसकी पुत्री राजमहल के सुख से वंचित हो कर जंगल में मारी मारी फिरे,लेकिन ये जज कोई साधारण जज नही है ,इन्होंने धर्म और प्रेम के मध्य की इस जंग को देखा,समझा और धर्म के ऊपर प्रेम को रखा मतलब जीत भरत की हुई लेकिन फिर क्या हुआ ,उन्होंने भरत पर ये भार डाला कि अपने प्रेम से जाकर पूछो कि उनका सुख किसमे है और उसके समक्ष आत्मसमर्पण कर दो , उफ .... भरत जो अब तक ज़िद में थे कि राम को वापस ले ही जायेंगे अचानक प्रेम का सही अर्थ समझ पाते है ,समझ जाते है अगर ज़िद कर वे भ्राता राम को वापस ले भी गए तो भी उन्हें सुकून नहीं दे पाएंगे ,भाई राम इस मलाल में रहेंगे कि वे धर्म से कहीं न कहीं चूक गए, तो उन्होंने surrender कर दिया, क्षमा प्रभु लेकिन ये चौदह बरस राजा तो आप ही होंगे ,मैं ये राज काज आपके नाम से ही सम्हाल सकूंगा, राम ने स्वीकार किया चौदह बरस मेरी अमानत तुम्हारे पास है,आने के बाद तुमसे अपना राज्य वापस ले लूंगा ।

क्या देखा है आपने ऐसा अद्भुत प्रेम कहीं,एक ने वन में भोगा बनवास तो दूजे ने अयोध्या में ।

बाकी तो लेखनी असमर्थ है पर जब भी ये प्रसंग छिड़ता है पलके स्वयं ही गीली हो जाती है ।

जय श्री राम ,जय भरत

शेष शुभ



 

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