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समीक्षा

 आज टीवी पर ' एक दूजे के लिए' फिल्म देख रही थी ,हालांकि ये फिल्म पहले भी कई बार देख चुकी हूं और ये भी मालूम है कि फिल्म अपने समय की सुपरहिट थी,लेकिन फिर भी फिल्म के अंत को देखने का मन नहीं किया, पता नहीं कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है,केवल दुखांत करने के लिए अच्छी खासी कहानी का सत्यानाश कर दिया है ।

हो सकता है ये केवल मेरी सोच हो लेकिन जरा कहानी में जाइए एक बेहद प्यारी सी लव स्टोरी जिसमे लड़का लड़की एक दूसरे की भाषा नहीं जानते लेकिन फिर भी प्रेम कर बैठते है ,मधुर गीतों से सजी फिल्म ,उम्दा अभिनय सभी कलाकारों का ,भाषा की समझ न होने के कारण एक दूसरे को समझाने के अलग अलग तरीके ढूंढना ,कुल मिलाकर कहानी में रोचकता की कोई कमी नहीं , ऊपर से कमला हासन टीना मुनीम और माधवी  जैसे कलाकार उनके  चेहरों का ताजापन ।

जब समाज उनके प्रेम को स्वीकार नहीं कर पाता तो विद्रोह और एक साल का वियोग ,इस वियोग में भी एक दूसरे को टूट कर चाहना ,सचमुच में एक उच्च किस्म की लव स्टोरी थी । 

कुछ समय के लिए कमला हासन यानी वासु के पात्र को जो भ्रम होता है उसे तोड़ने के लिए एक दूसरी अभिनेत्री माधवी जो स्वयं कमला हासन से प्रेम कर बैठती है, लेकिन टीना यानी सपना  के पात्र के प्रेम को देख कर नतमस्तक हो जाती है,एक भावुक दृश्य है जब वो कहती है हम दोस्त है, हम रोज हाथ मिलाते हैं यहां टीना उससे जलने की बजाय उसके हाथ को चूम लेती है क्योंकि उसके प्रेमी ने उसके हाथ को स्पर्श किया है,कितने उच्च किस्म का प्यार ।

फिल्म में अनेक गुदगुदाने वाले दृश्य है , और अनेक भावुक करने वाले भी ,और कलाकारों ने अपने अभिनय से उन दृश्यों में जान डाल दी है चाहे वो उनकी भाषा की नासमझी हो, चाहे लाइट चालू बंद कर अपने प्रेम का इजहार हो ,चाहे पूरी दीवार में वासु वासु लिखना हो या फिर वासु की जली हुई तस्वीर को चाय में घोल कर पी जाने का दृश्य हो ।

पर मुझे सचमुच में समझ नहीं आता इसके अंत को इतना निराशाजनक क्यों बनाया गया , क्या कोई दूसरा निर्माता या निर्देशक है जो इस तरह के पवित्र प्रेम को इतने ही प्यार से फिल्माए और अंत सुखद कर दे। 

काश दर्शकों को अनुमति होती कि वे अपना पसंदीदा अंत देख सके तो मुझे पूरी उम्मीद है दर्शक सुखांत ही देखना पसंद करते ना केवल फिल्म में ही  नहीं बल्कि रियल लाइफ में भी।


क्या आपको ऐसा नहीं लगता 

शेष शुभ।

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