जब पहली बार कोरोना 🦠 वायरस का भारत में आगमन हुआ तो भय के साथ एक नई चीज़ और आई, वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन क्लास , ये कुछ नया था हम शिक्षकों के लिए भी और बच्चों के लिए भी, रोज़ की सुबह की भागदौड़ से कुछ राहत थी ,पहले पढ़ाई शुरू की व्हाट्सएप में फिर होते होते गूगल मीट तक जा पहुंची,आज सभी ने ऑनलाइन पढ़ाईकी नई नई तकनीकें सीख ली है , सीखना जारी है,अभी भी बहुत कुछ बाकी है लेकिन यहां सबसे बड़ी बात जो उभरकर आती है विद्यार्थियों का कितना फायदा हुआ , तो जवाब ज्यादा सकारात्मक नहीं है, जो विद्यार्थी स्वयं जागरूक है वे तो भागदौड़ से निजात पा कर राहत महसूस कर रहे है और उन्होंने अपना लक्ष्य भी निर्धारित कर लिया है,लेकिन अनेक ऐसे भी है जो जरूरत से ज्यादा रिलैक्स हो चुके हैं,लिखना तो जैसे बच्चें भूल ही चुके है हालांकि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चें फिर भी सक्रिय रहते हैं कैमरा ऑन रखते है,लेकिन बडी कक्षाओं में बार बार बोलने के बाद भी कैमरा ऑन नही होता जाहिर है सोकर, उठकर केवल अटेंडेंस के लिए मीटिंग ज्वाइन तो कर लिया लेकिन पढ़ा क्या ये तो वे स्वयं ही जानते है, यहां तक कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी ऑनलाइन, बिना प्रैक्टिकल के प्रशिक्षण के विद्यार्थी क्या अर्जित कर रहे है पता नहीं,ऐसा नहीं कि शिक्षक पढ़ा नहीं रहे , सच तो ये है कि ऑनलाइन में शिक्षण हेतु मेहनत ज्यादा लगती हैं, यहां लिमिटेड टाइम में आपको उन्हें सब कुछ देना है , जाहिर है, मैटेरियल अधिक रुचीपूर्वक बनाने की आवश्यकता है,फिर शेयर करना , तकनीकी दिक्कतों से दो चार होना ,कई शिक्षक विभिन्न सामग्री खरीद रहे हैं अथवा अपना जुगाड लगा रहे है ताकि बच्चों तक सारी सामग्री पहुंच सके ।
लेकिन एक कसक बाकी है ,गहरे तक बाकी है, दिक्कतें हैं,
कमजोर नेटवर्क का होना आप बड़े अच्छे से पढ़ा रहे हैं पूरी तरह से फ्लो में है अचानक नेटवर्क की समस्या उत्पन्न हो जाती है या फिर विद्यार्थियों के पास भी नेटवर्क की समस्या उतनी ही कशमकश के साथ उत्पन्न होती है कई विद्यार्थियों के अभिभावकों को फोन करने पर पता चलता है कि उनके पास नेटवर्क इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं है कुछ विद्यार्थी दूरदराज के इलाकों में रहते हैं उनके लिए तो यह समस्या और भी गहरी हो जाती हैं, हालांकि जो सीखना चाहते हैं वे किसी न किसी तरह से जुगाड़ भिड़ा ही लेते हैं परंतु जिन्हें बहाना बनाना है उसका तो कोई उपाय नहीं, परंतु कुछ बहाने सही भी होते हैं ,फिर तकनीक का ज्ञान भी आड़े आता है ,कई बार बच्चें प्रश्न का उत्तर तो दे रहे होते है लेकिन उनकी आवाज नहीं सुनाई देती,कभी कैमरा ऑन होने पर भी चेहरा नहीं दिखता,कभी बिजली ही दगा दे जाती हैं, इतना सब होने के बाद भी कई बार ना तो बच्चें ना तो अभिभावक भेजी गई सामग्री को खोल कर देखना चाहते हैं।
एक बहुत बड़ी समस्या है स्क्रीन टाइम की विद्यार्थी को अब 📱 मोबाइल या लैपटॉप, पीसी देना आवश्यक हो गया है अब इस बात की निगरानी कौन करे कि बच्चा पढ़ ही रहा है या किसी भी साईट में स्वतंत्र विचरण कर रहा है,फिर अभी चश्में की दुकानों में अप्रत्याशित भीड़ बड़ने लगी है ,जिन्हें लगा नहीं था उन्हें चश्मा लग चुका है,और जिन्हें लगा था उनका नम्बर बढ़ चुका है
फिर जो एक भावनात्मक लगाव होता है विद्यार्थियों और शिक्षकों के मध्य उसका क्या करे बच्चें सब कुछ मिस कर रहे है साथ में लंच का लुत्फ उठाना,lab की मस्ती , प्लेग्राउंड की उछलकूद और भी ना जाने क्या क्या , प्राइमरी के विद्यार्थी तो अपनी पहली असेंबली भी अब तक नहीं अटेंड कर पाएं है ।
ऐ स्कूल , जरा तू बता
कब होगा गुलजार तुझमें बचपन का जहां
कब तक रहेगा बचपन घर में दफ़न
कब मिलेगा, उसे उन्मुक्त आकाश का चमन
आशा है ये वक्त भी जल्द गुजर जाएगा
शेष शुभ
रागिनी गुरव
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