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एक कप चाय की क़ीमत

शुभी लंच ब्रेक में भी अपना काम निपटाने में लगी हुई थी। सहकर्मियों से वार्तालाप भी चालू था
अचानक बातचीत पतियों पर जा टिकी।सुबह हम दोनों को ही ऑफिस के लिए निकलना होता हैं,लेकिन काम सारा मुझे ही करना पड़ता है। ज्यादातर सहकर्मी सहमत थीं।हालांकि इसमें शिकायत से ज्यादा हसी मजाक का पुट था।आखिर पति होते ही ऐसे है।मिसेज मानसी ने कहा ,हा मेरे पति भी केवल सुबह की चाय बना कर देते है,और कुछ नहीं करते,अचानक शुभी के हाथ रुक गए।केवल चाय ।इस एक चाय के लिए ही अक्सर वो कितना तरस जाती है,सुबह उठते बराबर सबसे पहले एक चाय की ही तो तलब होती है ,लेकिन उठते बराबर पहले कुकर चढ़ाओ,फिर बच्चों का ,अपना टिफिन तैयार करो,दोपहर के लंच की भी तैयारी करके रखनी होती है,फिर टिफिन पैक करना ,बोतल भरना,खुद तैयार होना,भागते दौड़ते ऑफिस पहुंचना ,उसमे भी एक डर अगर रजिस्टर बॉस के कमरे में पहुंच गया तो,उनका घूरता हुआ चेहरा देखना।
उफ़ कितनी मारामारी होती है सुबह समय की,कई बार चाय बना तो लेती है लेकिन गरमागरम चाय पीने का वक्त नहीं होता।बनी बनाई चाय आने के बाद फेकनी पड़ती है।कितना अफसोस होता है,हा जिस दिन चाय का प्याला पी लेती ,ऐसा लगता आज का दिन बन गया।
तो जब मिसेज मानसी ने ऐसा कहा कि मेरे पति सिर्फ चाय बना कर देते है तो शुभी खुद को रोक नहीं पाई,आप बहुत लकी है,  जो सुबह की चाय तो नसीब होती है ,एक मुझे देखो सुबह कई बार बना नहीं पाती,कई बार बना के भी पी नहीं पाती ।कभी कभार ही होता है, चाय बना कर पी पाती हूं।हसी मजाक के इस दौर में ही ब्रेक ख़तम हो गया।
पर इस चाय ने शुभी को बहुत सारी बाते निश्चित ही याद दिला दी थी।

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