कहते है कि किसी कहानी का अंत या तो सुखद होगा या फिर दुखद या फिर कहानी का अंत पाठक के उपर छोड़ दिया जाएगा ,चाहे जो भी हो लेकिन मै निराशावादी कहानियों के प्रति सहज नहीं रह पाती।आखिर कोई कहानी निराशावादी कैसे हो सकती है,मेरे ख़्याल से कहानी अधूरी हो सकती है परन्तु निराशावादी नहीं,निराशा में भी कहीं ना कहीं आशा की एक लौ टिमटिमाती रहती है, हमेशा।
कई फिल्में जब टीवी पर दुबारा देख रहे हो तो वो भाग जिसमें आशा हो , ख़ुशी हो दोबारा देखने का मन करता है ,वहीं निराशा वाले भाव में चैनल बदलने में वक्त नहीं लगता।
एक फिल्म आयी थी बहुत पहले ' एक दूजे के लिए'.बड़ी प्यारी पिक्चर है लेकिन जाने क्यों फिल्म का अंत देखने का मन नहीं करता।ऐसे ही राजश्री की जितनी भी फिल्में है,उसकी आशा और खुशी के कारण कहानी मालूम होते हुए भी बोरिंग नहीं लगती।
कितनी भी निराशा क्यों ना हो आशा की पतवार अगर हो तो भारी तूफान से भी नाव को किनारे लगा ही देगी।
क्यों आपको ऐसा नहीं लगता?
आशा है तो आकाश है।
कई फिल्में जब टीवी पर दुबारा देख रहे हो तो वो भाग जिसमें आशा हो , ख़ुशी हो दोबारा देखने का मन करता है ,वहीं निराशा वाले भाव में चैनल बदलने में वक्त नहीं लगता।
एक फिल्म आयी थी बहुत पहले ' एक दूजे के लिए'.बड़ी प्यारी पिक्चर है लेकिन जाने क्यों फिल्म का अंत देखने का मन नहीं करता।ऐसे ही राजश्री की जितनी भी फिल्में है,उसकी आशा और खुशी के कारण कहानी मालूम होते हुए भी बोरिंग नहीं लगती।
कितनी भी निराशा क्यों ना हो आशा की पतवार अगर हो तो भारी तूफान से भी नाव को किनारे लगा ही देगी।
क्यों आपको ऐसा नहीं लगता?
आशा है तो आकाश है।
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