Skip to main content

आशा है तो आकाश है

कहते है कि किसी कहानी का अंत या तो सुखद होगा या फिर दुखद या फिर कहानी का अंत पाठक के उपर छोड़ दिया जाएगा ,चाहे जो भी हो लेकिन मै निराशावादी कहानियों के प्रति सहज नहीं रह पाती।आखिर कोई कहानी निराशावादी कैसे हो सकती है,मेरे ख़्याल से कहानी अधूरी हो सकती है परन्तु निराशावादी नहीं,निराशा में भी कहीं ना कहीं आशा की एक लौ टिमटिमाती रहती है, हमेशा।
कई फिल्में जब टीवी पर दुबारा देख रहे हो तो वो भाग जिसमें आशा हो , ख़ुशी हो दोबारा देखने का मन करता है ,वहीं निराशा वाले भाव में चैनल बदलने में वक्त नहीं लगता।
एक फिल्म आयी थी बहुत पहले ' एक दूजे के लिए'.बड़ी प्यारी पिक्चर है लेकिन जाने क्यों फिल्म का अंत देखने का मन नहीं करता।ऐसे ही राजश्री की जितनी भी फिल्में है,उसकी आशा और खुशी के कारण कहानी मालूम होते हुए भी बोरिंग नहीं लगती।
कितनी भी निराशा क्यों ना हो आशा की पतवार अगर हो तो भारी तूफान से भी नाव को किनारे लगा ही देगी।
क्यों आपको ऐसा नहीं लगता?
आशा है तो आकाश है।

Comments

Popular posts from this blog

आपस की बात

 प्रिय अभिभावक, मैं आपके बच्चों की गणित की शिक्षक या शिक्षिका  आपसे कुछ बात कहना चाह रही हूं, क्या आप सुनने को तैयार है, मैं जानती हूं आपमें से अधिकांश के पाल्य किसी न किसी कोचिंग संस्था या नामी गिरामी ट्यूशन क्लासेज में जाते है, आप लोगों को शायद अपने बच्चों से बहुत उम्मीद भी है कि वे बेहद व्यस्त रहते है , दिन भर की भाग दौड़ में थक कर चूर हो जाते है, लेकिन जरा गौर से सुनिए जो मैं कहना चाह रही हूं, महोदय आपके बच्चें नहीं पढ़ रहे है , आपको शायद ये लगता होगा कि ट्यूशन, कोचिंग और स्कूल मतलब बच्चें तो आइंस्टाइन बन कर न भी निकले तो कम से कम फर्स्ट डिविजन तो ले ही आयेंगे लेकिन माफ़ कीजिएगा ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है , बच्चों से साधारण जोड़ने , घटाने, गुणा, भाग के सवाल भी नहीं बन पा रहे है , जिन प्रश्नों को बार बार ये कह कर समझाया गया कि ये या इस तरह के प्रश्न एग्जाम में जरुर आते है उसे भी करने में वे असमर्थ है , ज़रा रुकिए गलती कहां हैं, गलती कहां हो रही है, क्या रुक कर विश्लेषण करना चाहेंगे आप या हर किसी की तरह आप भी सारी गलतियों का ठीकरा शिक्षकों के सर पर डाल देना चाहेंगे। नंबर 1 ...

महाकालेश्वर धाम में एक दिन

 विद्यालय में चर्चा चल रही थी कहीं चलते हैं साथ साथ क्योंकि सोचते सोचते बहुत दिन बीत जाते है , मैने कहा यदि कही दूर नहीं जा सकते तो अपने पड़ोस में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर आते है , हम घूमने के उद्देश्य से नहीं ईश्वर के दर्शन के उद्देश्य से जाएंगे तो ईश्वर ही प्रबंध भी कर देंगे , बस टिकट बुकिंग हुई , जिस दिन गर्मी की छुट्टियां लगनी थी उसी दिन रात की ट्रेन बीकानेर बिलासपुर से, वहां सीता mam भी मिल गई उनका ट्रांसफर हो गया था राजस्थान, मैं, शिवानी mam , उनकी माताजी और हमारी नन्हीं बॉस केशू , सफर आराम से बीता , निर्विघ्न और साथ जो परिवार था बोगी में उनके साथ भी अच्छे से चर्चा होती रही उनके साथ जो नन्हा अक्षय था वो तो केशू को मेरा है कहने लगा। स्टेशन में गाड़ी सही समय पर पहुंच गई, कोई 12 बजे के आसपास हम स्टेशन में थे विचार ही कर रहे थे कैसे जाए , कहां ठहरे , e रिक्शा के एक ड्राइवर ने 20 रुपए प्रति सवारी में तय किया उन लोगों का कमिशन बंधा होता है लेकिन हमें भी सौदा महंगा नहीं लगा , हम सबने उसी के दिखाए होटल जुगनू में रूम ठीक किया , नहा धो कर माताजी के लिए रूम में ही खाना मंगाय...

लेडीज़ बोगी में महिलाएं

 लेडीज़ बोगी में खुलकर खिलखिलाती है महिलाएं दो की सीट में तीन और तीन की सीट में चार सफर करती मिल जाती है महिलाएं। और तो आराम से बोगी के फर्श में भी बैठी नज़र आती है महिलाएं। अक्सर ऑफिस की कशमकश को मस्ती और हंसी में उड़ाती नज़र आती है महिलाएं। सुबह- सुबह की भागमभाग में बिना तैयार हुए आई और ट्रेन में ही खुद को संवारती दिख जाती है महिलाएं। अनजान महिला सहयात्रियों से भी अपनी फीलिंग्स बांटती नज़र आ जाती है महिलाएं। पेट पूजा हो या ऑफिस के काम या हो पढ़ाई प्रतियोगिता का सवाल, इस सफ़र में निबटाती नज़र आ जाती है महिलाएं। कुछ पुरुष सहयात्री जब जबरन चढ़ जाते है लेडीज़ बोगी में तो पहले तो विनम्रता से समझाती है महिलाएं। अगर समझ गए तो ठीक नहीं तो दूसरे विकल्प में उतर आती है महिलाएं। कुछ कहते है जब महिला पुरुष में फर्क नहीं तो ये विशेषाधिकार महिलाओं को ही क्यों? तो प्रस्तुत है इसका भी जवाब जनरल बोगी में सब तो नहीं पर कई अनजान पुरुषों के अनचाहे स्पर्श को क्यों करें स्वीकार। मुख में गुटखा पान और न जाने क्या-क्या चबाते, अनजाने में और कभी जान कर भी किसी महिला के ऊपर जबरन गिरने वालों को कैसे न करें इनक...