आज एक छोटी सी घटना साझा करना चाहती हूं।
बच्चों के लिए चिप्स के पैकेट लेने के लिए दुकान गई ।परिचित दुकान थी। मै कुछ बोलती ,लेकिन मैंने देखा दुकान वाला बड़ी ही तल्लीनता से कुछ सिक्के और कुछ पुराने नोट गिन रहा था।एक पुराना सा कपड़ा था जिसमें ये पैसे रखे हुए थे, मैंने देखा, देने वाली एक वृद्ध महिला थी ,फटी तो नहीं लेकिन बेहद पुरानी साड़ी में लिपटी हुई।शायद उसने बड़े जतन से वे पैसे इकट्ठे किए थे।दुकान वाले ने कहा दाई(मा को ) ९४ रुपए ५० पैसे है का दू ।
उस बुड्ढी मा ने कहा दे दे चावल , दाल, तेल,नून,मिर्ची, सककर, चायपत्ती।कुल मिलाकर वो उन ९४ रूपयो में सब कुछ चाह रही थी लेकिन दुकान वाले ने बड़े ही धीरज से सारी चीज़ो की लिस्ट बनाई जोड़ तोड़ किया किसी में कुछ कम किसी में कुछ ज्यादा लेकिन अंततः उसकी अपेक्षित सारी चीजो का हिसाब लगा लिया १५ रू का चावल कुछ का दाल इतने की पत्ती आदि आदि, और उसे उतने ही जतन से बांधने भी लगा ऐसा लग रहा था जैसे पूजा के लिए पण्डित जी सारी सामग्री एकत्र कर रहे हो और अंत में १-२ ₹बच गए तो उसका उसने २ आलू भी रख दिया । बुढ़िया तृप्त हो कर सामान ले कर जाने लगी दुकान वाले के चेहरे में भी संतोष का भाव था मुझे जल्दी थी लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक आनन्द मुझे भी हुआ । एक संतोष की मुस्कान मेरे ओठों में भी आ गई ।फिर फुरसत पा कर दुकान वाले ने मुझे देखा क्या चाहिए दीदी ? लेकिन मुस्कान उसके चेहरे पे भी थी ।
सच तो है, खुशीके लिए कोई बड़ी वजह तो नहीं चाहिए ।किसी की छोटी सी आकांक्षा की पूर्ति भी तो खुशी का कारण बन सकती है, है ना ।
बच्चों के लिए चिप्स के पैकेट लेने के लिए दुकान गई ।परिचित दुकान थी। मै कुछ बोलती ,लेकिन मैंने देखा दुकान वाला बड़ी ही तल्लीनता से कुछ सिक्के और कुछ पुराने नोट गिन रहा था।एक पुराना सा कपड़ा था जिसमें ये पैसे रखे हुए थे, मैंने देखा, देने वाली एक वृद्ध महिला थी ,फटी तो नहीं लेकिन बेहद पुरानी साड़ी में लिपटी हुई।शायद उसने बड़े जतन से वे पैसे इकट्ठे किए थे।दुकान वाले ने कहा दाई(मा को ) ९४ रुपए ५० पैसे है का दू ।
उस बुड्ढी मा ने कहा दे दे चावल , दाल, तेल,नून,मिर्ची, सककर, चायपत्ती।कुल मिलाकर वो उन ९४ रूपयो में सब कुछ चाह रही थी लेकिन दुकान वाले ने बड़े ही धीरज से सारी चीज़ो की लिस्ट बनाई जोड़ तोड़ किया किसी में कुछ कम किसी में कुछ ज्यादा लेकिन अंततः उसकी अपेक्षित सारी चीजो का हिसाब लगा लिया १५ रू का चावल कुछ का दाल इतने की पत्ती आदि आदि, और उसे उतने ही जतन से बांधने भी लगा ऐसा लग रहा था जैसे पूजा के लिए पण्डित जी सारी सामग्री एकत्र कर रहे हो और अंत में १-२ ₹बच गए तो उसका उसने २ आलू भी रख दिया । बुढ़िया तृप्त हो कर सामान ले कर जाने लगी दुकान वाले के चेहरे में भी संतोष का भाव था मुझे जल्दी थी लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक आनन्द मुझे भी हुआ । एक संतोष की मुस्कान मेरे ओठों में भी आ गई ।फिर फुरसत पा कर दुकान वाले ने मुझे देखा क्या चाहिए दीदी ? लेकिन मुस्कान उसके चेहरे पे भी थी ।
सच तो है, खुशीके लिए कोई बड़ी वजह तो नहीं चाहिए ।किसी की छोटी सी आकांक्षा की पूर्ति भी तो खुशी का कारण बन सकती है, है ना ।
शेष शुभ
द्वारा
रागिनी गुरव
J
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